• Nakoda Ji Jain Tirth

History of Shri Nakoda ji Tirth

It is assumed to have been called as Veerampur in old days. Two brothers, namely Veersen and Nakorsen, had established two cities at a difference of 20 miles and named them as Veerampur and Nakornagar respectively. Veersen established the temple of Shri Chandraprabh Bhagwan while Nakorsen of Shri Suparshwanath Bhagwan in their cities. The establishment (Pratishtha) of the temples was performed by Arya Shri Sthulibhadra Swamiji at both places. King Samprati pratibodhak Acharya Shri Suhasti Surishwarji, Acharya Shri Siddhsen Divakar – the Ratna in kings court of King Vikramaditya, writer of Bhaktamar Strotra Acharya Shri Mantung Surishwarji, Shri Kalakacharya, Shri Haribhadra Suriji, Shri Dev Suriji and many other scholar Acharyas has initiated the then kings with their efforts from spiritual speeches to perform the renovation works at these temples. Nakornagar existed up to 13th century. Later on people migrated to other nearby place at the time of attacks by Alam Shah. When Alamshsh invaded this place in the year 1280 of the Vikram era (1224 AD), the Jain Sangha kept this idol hidden in the cellar in the Kalidrah village situated at a distance of 4 miles from the temple for protection. During 909, 2700 Jain followers settled in the Veerampur city. One among them, Shri Harakhchandji renovated the old temple and established Shri Mahaveer Bhagwan idol as the Moolnayak. Descriptions of renovation work done in 1223 also exist. Alam Shah also attacked Veerampur and damaged heavily the temple in 1280. It was the beginning era of 15th century that the renovation works to rehabilitate the damaged temple started. The idols of Nakornagar, kept at Kalidrah village were brought here and the idol of Shri Parshwanath Bhagwan was chosen & established in the temple as the Moolnayak of it in 1429. As the Moolnayak idol belonged to Nakornagar, this teerth was called as the Nakoda teerth. This temple was again renovated in the fifteenth century. 120 idols were brought here from Kalidrah and this beautiful and miraculous idol was installed here as Mulnayak (main idol of the temple) in the year 1429 of the Vikram era (1373 AD). Jain Acharya Kirtiratnasuri installed the idol Bhairav here. Apart from Nakoda Parsvanatha the other Jain temples here are dedicated to Rishabhadeva and Shantinath. The Parsvanatha Jain temple was originally a temple of Mahavira.

As per another myth, the Mulnayak idol was recovered from a pond situated next to Sinadari village near Nakornagar, which later on brought & established as the Mulnayak idol in this temple in 1429 by Bhattarak Acharya Shri Uday Surishwarji. And from this day onwards this teerth place became famous as Nakoda teerth. The miraculous deity of this place, Shree Bhairavji Maharaj was ceremoniously installed here in samvat 1511 by Acharya Kirtiratna Suri. This pilgrimage continuously prospered after the installation of Nakoda Bhairav. The miracles of this place found abode in the minds of the people. The devotees poured in from various places of the country and abroad. From time to time the pilgrimage has been restored and salvaged too.
Till the seventeenth century, Jains were in majority in this pilgrimage, but later on, the residents of this place went to other villages and towns nearby and settled there.

Importance:

There are tree temples – the main temple is of Shri Nakoda Parshwanath Bhagwan Ji, second temple is of Shri Adinath Bhagwan Ji and the third temple is of Shri Shantinath Bhagwan Ji. All the three temples have built with an excellent architecture. Apart from this, there are various temples. The idol of Lord Shri Parshwanath Ji is the main idol of this shrine and it is famous as Nakodaji in the world. Some idols of Gods and Goddesses are situated here from the time period of an emperor Ashoka. Many Jain and Non-Jain devotees visit here. This place is full of miracles. An ancient idol of Shri Parshwanath Bhagwan Ji is very impressive and full of miracles. Many devotees come here to fulfill their wishes. Around the temple, the view of hilly area is so pleasing. Unique sculptures of the main temple is worth to see. It’s a healing temple for mind, body and soul. This place is very huge and awesome. The vibes are full of positivity.

Festivals:

Shri Parshwanath Janam Diksha Kalyanak Festival, Shavpat Navpad Oliji, Paryushan Parva Aradhna, Mahavir Jayanti.

भैरव का मूल स्वरुप

भैरव एक अवतार हैं।उनका अवतरण हुआ था।वे भगवान शंकर के अवतार हैं। भैरव देव के दो रूप – 1) काला भैरव या काल भैरव (उनके रंग के कारण नाम काला भैरव पड़ा)।जिसने काल को जीत लिया वो काल भैरव हैं।आधी रात के बाद काल भैरव की पूजा-अर्चना की जाती है। श्री काल भैरव का नाम सुनते ही बहुत से लोग भयभीत हो जाते है और कहते है कि ये उग्र देवता है। लेकिन यह मात्र उनका भ्रम है। प्रत्येक देवता सात्विक, राजस और तामस स्वरूप वाले होते है, किंतु ये स्वरूप उनके द्वारा भक्त के कार्यों की सिद्धि के लिए ही धारण किये जाते है। श्री कालभैरव इतने कृपालु एवं भक्तवत्सल है कि सामान्य स्मरण एवं स्तुति से ही प्रसन्न होकर भक्त के संकटों का तत्काल निवारण कर देते है।

हिन्दू देवी देवताओं में सिर्फ ऐसे दो देव माने जाते हैं जिनकी शक्ति का सामना कोई नहीं कर सकता । एक माँ काली और दूसरा भैरव देव।इसीलिए इनकी शक्ति साधना में प्रथम स्थान है।माँ काली के क्रोध को रोकने के लिए भगवान शिव ने बालक रूप धारण कर लिया था जो बटुक भैरव कहलाया और जो काल भैरव के बचपन का रूप माना जाता है। बटुक भैरव को काली पुत्र इसलिए कहा जाता है क्यूँकी ये शिव का रूप हैं और इन्होंने काली में ममता को जगाया था। काल भैरव के मुकाबले ये छोटे बच्चे हैं।इसीलिए इनमें ममत्व है जो माफ़ कर देते हैं लेकिन उग्र रूप के कारण ये रुष्ट बहुत जल्दी होते हैं। काल भैरव अकेले शांति में रहना पसंद करते हैं, बटुक भैरव भीड़ में।दोनों की भक्ति साधना बहुत जल्द फलदायी होती है। ये अतिवेगवान देव हैं।ये भक्ति के भूखे हैं।बटुक भैरव को ही गोरा भैरव कहा जाता है।

नाकोड़ा तीर्थ में विराजित भैरव

प.पू. गुरुदेव हिमाचल सुरिश्वर जी म.सा. तीर्थ का विकास एवं देखभाल की व्यवस्था में जुटे थे।एक दिन रात्रि के समय अपने उपाश्रय में पाट पर सो रहे थे। सुबह ब्रह्ममुहूर्त में एक छोटा सा बालक पाट के आसपास घूमता हुआ दिखाई दिया।गुरुदेव पाट पर बैठ गए। फिर बालक को बुलाया और पूछा,” अरे बालक यहाँ क्यूँ घूमता है ? किसका है तू ?” उसी वक़्त वह बालक बोला,” मैं यहाँ का क्षेत्रवासी भैरवदेव हूँ।आप महान आचार्य श्री हैं।आप इस तीर्थ का विकास करें। मैं आपके साथ हूँ।परन्तु मुझे भगवान पार्श्वनाथ जी के मंदिर में एक आले में विराजमान करो। ऐसा बोलकर भैरव जी अदृश्य हो गए। गुरुदेव विचार में पड़ गए। परमात्मा के मंदिर में भैरव जी को कैसे बिठाया जाए ? क्यूंकि भैरवजी को सिन्दूर, बलि, मदिरा आदि सब चढ़ते हैं।जैन मंदिर में यह सारी चीजों की बिलकुल अनुमति नहीं हैं। गुरुदेव दुविधा में पड़ गए की क्या करना ?
फिर एक दिन भैरव देव को जाग्रत करने के लिए साधना में बैठ गए। साधना पूर्ण होने पर भैरव देव प्रत्यक्ष हुए और कहा,” बोलो गुरुदेव ?” गुरुदेव ने कहा,” आपको हम मंदिर में विराजमान करेंगे परन्तु हमारे जैन धर्म के नियमों में प्रतिबद्ध होना पड़ेगा। तब भैरव देव बोले,” ठीक है, जो भी आप नियम बतायेंगे वो मैं स्वीकार करूँगा।” गुरुदेव बोले,” आपको जो अभी वस्तुएं भोग रूप में चढ़ती हैं, वो सब बंद होंगी।आपको हम भोग रूप में मेवा, मिठाई कलाकंद तेल आदि चढ़ाएंगे।आपको जनेउ धारण करनी पड़ेगी। विधि विधान के साथ समकित धारण करवाकर आपको ब्रहामण रूप दिया जाएगा।
भैरवदेव बोले,” मेरा रूप बनाओ।” “आपका रूप कैसे बनायें ?” तब भैरवदेव ने कहा कि जैसलमेर से पीला पत्थर मंगवाकर कमर तक धड़ बनाओ। नाकोड़ा जी जैन तीर्थ पेज की अथाह जाँचच के पश्चात यह जानकारी मिली कि, गुरुदेव ने मुनीमजी भीमजी को जैसलमेर भेजा और वहां से पीला पत्थर मँगवाया। पत्थर भी इतना अच्छा निकला।सोमपुरा मूर्तिकार को बुलाकर मूर्ति का स्वरुप बताया। पिंडाकार स्वरुप को मुंह का स्वरुप देकर मुँह और धड़ को जोड़ा और अति सुन्दर मोहनीय भैरवजी की मूर्ति बनायीं। नयनाभिरम्य मूर्ति को देखकर सब खुश हो गए। शोध कर्ता श्री नाकोड़ा जी जैन तीर्थ पेज टीम के अनुसार, वि.सं.1991 माघ शुक्ला तेरस गुरु पुष्ययोग में भैरवजी को विधि विधान के साथ नियमों से प्रतिबद्ध करके जनोउं धारण करवाकर शुभ वेला में पार्श्वनाथ प्रभु के मूल गम्भारे के बाहर गोखले में विराजमान किया गया। भैरवजी का स्थान खाली ना रहे इसलिए हनुमानजी की मूर्ति स्थापित की। इस प्रकार नाकोड़ा तीर्थ के मूल गम्भारे में बटुक भैरव ( बाल स्वरुप) विराजित हैं।

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